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अनुभव · 5d ago

बाबूजी का गाम

बाबूजी का गाम-गिरीन्द्र नाथ झा-------------बाबूजी का गाम दूर थाउस गाँव सेजहाँ वे रहते थेबाबूजी का गामउनका 'देस' थाकोसी के उस पार।कोसी के इस पार तो वे किसान थेलेकिनउस पार थे'धान-पटुआ वाले' !ब...
अनुभव · 1w ago

चनका के किसान की डायरी

आलू, सरसों उपजाने के बाद किसानी करने वाले अभी हरियाली में डूबे पड़े हैं। खेतों में मक्का लहलहा रहा है। खेत की हरियाली इन दिनों देखते बनती है। मक्का की हरियाली में खेत डूबा हुआ है। वहीं जलजमा...
अनुभव · 3W ago

पूंजी के लिए परेशान किसान

गाँव का हरीश कमाई को लेकर हमेशा परेशान रहता है। इस बार आलू की पैदावार अच्छी हुई लेकिन क़ीमत नहीं मिलने के कारण हरीश फिर से परेशान है। यह किसान बार -बार पंजाब का ज़िक्र करता है। हरीश को बताता...
अनुभव · 3W ago

आलू को लेकर बात क्यों नहीं?

देश विरोध के मूड में है। राजधानी से लेकर ज़िला तक में 'रंग बिरंग' का विरोध हो रहा। आभासी दुनिया से लेकर कॉलेज कैंपस तक। हर रंग का विरोध। भक्त का विरोध , भक्त विरोधियों का विरोध। गाली-गलौच, ध...
अनुभव · 1M ago

करवट लेता खेती का पेशा

किसानी करते हुए खेत के अलावा उन गाँव तक पहुँचने की इच्छा हमेशा रही है जहाँ बहुत कुछ अलग हो रहा है। इसी अलग देखने की ख़्वाहिश लिए हाल ही में बिहार के पूर्वी चम्पारण के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में...
अनुभव · 1M ago

गाम से बजट की बातें

सरस्वती पूजा के कारण गाम में लाउड स्पीकर की आवाज़ बुलंद है। बुनिया की महक चारों तरफ़ है लेकिन इन सबके बीच रेडियो के ज़रिए वित्त मंत्री अरुण जेटली की आवाज़ सुनता रहा।  मंत्री जी की भी आवाज़ ब...
अनुभव · 2M ago

ज़मीन और नीम

एक जिद जमीन की भी होती है, जिसके संग कागज का मोह जुड़ा होता है। कागज भी कमाल का!  जमीन की दिशा-दशा-मालिकाना सब कागज की उस पुड़िया में बंधी रहती है और जिद देखिए हर कोई उसे अपने हिस्से रखने की...
अनुभव · 2M ago

बाबूजी की याद आ रही है..

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा क...
अनुभव · 2M ago

ग्रीटिंग कार्ड का गुज़रा ज़माना

देखिए फिर एक नया साल आ गया और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे। शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं। उम्मीद पर ही दुनिया क़ायम है। हम सब बेहतर कल की...
अनुभव · 2M ago

किसान की डायरी-३१ दिसंबर, २०१६

साल के आख़िरी दिन में अपनी लीची बाड़ी में कुछ बुज़ुर्ग लोगों से बातचीत में लगा हूं। रामनरेश चाचा कह रहे हैं - " ई मोदी -मोदी करते हुए नोटबंदी  का गाना कब चालू हो गया, कुछ पता ही नहीं चला, ख़...