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काव्य का संसार · 4d ago

हमारे बुजुर्ग....

काव्य का संसार · 1M ago

गुजरते लम्हे.

हर "दिन" अपने संग कुछ लेकर आता है कभी कुछ  हमसे ले कर चले जाता है, जो कभी टूटे जाये कोई ख़्वाब अपना, तो अगला पल फिर नयी उम्मीदे ले अाता है, किसी पल जो गम में भींग जाये आँखे, तो अगला लम्हा ...
काव्य का संसार · 1M ago

सर्दी में दुबकी कवितायें

छुपा चंद्रमुख ,ओढ़े कम्बल ,कंचन बदन शाल में लिपटा ना लहराते खुले केश दल ,पूरा  तन आलस में  सिमटा तरस गए है दृग दर्शन को ,सौष्ठव लिए हुए उस तन के मुरझाये से ,दबे पड़े है , विकसित पुष्प ,सभी यौव...
काव्य का संसार · 1M ago

डर और प्यार

जो विकराल ,भयंकर होते ,और दरिंदगी जो करते है या फिर भूत,पिशाच,निशाचर,इन सबसे हम सब डरते है बुरे काम से डर लगता है ,पापाचार  डराता हमको कभी कभी थप्पड़ से ज्यादा ,झूंठा प्यार डराता हमको माँ तो ...
काव्य का संसार · 1M ago

बीते दिन

         बीत गए दिन गठबंधन के अब तो लाले है चुम्बन के सभी पाँचसौ और हज़ारी ,नोट बन्द है ,यौवन धन के ना उबाल है ना जूनून है एकदम ठंडा पड़ा खून है मात्र रह गया अस्थिपंजर ,ऐसे हाल हुए इस तन  के म...
काव्य का संसार · 1M ago

सर्दी और बर्फ़बारी

         उनने तन अपना ढका जब ,श्वेत ऊनी शाल से,             लगा इस पहाड़ों पर बर्फ़बारी हो गयी     बादलों ने चंद्रमा को क़ैद जैसे कर लिया ,         हुस्न के दीदार पर भी ,पहरेदारी हो गयी जिनकी ह...
काव्य का संसार · 1M ago

पुराने नोटों की अंतर पीड़ा

    एक वो भी जमाना था,हम सभी के थे दुलारे प्यार  करते  थे  हमें सब, चाहते बांहे पसारे झलक हल्की सी हमारी ,लुभाती सबका जिया थी छुपा दिल सा,साड़ियों में ,हमें रखती गृहणियां थी उनके पहलू में कभी...
काव्य का संसार · 2M ago

मटर के दानो सी मुस्कान

 माँ ,जो सारा जीवन,सात बच्चों के परिवार को ,सँभालने में रही व्यस्त हो गयी काम की इतनी अभ्यस्त बुढापे में ,बिमारी के बाद ,जब डॉक्टर ने कहा करने को विश्राम बच्चे ,काम नहीं करने देते ,और उसका म...
काव्य का संसार · 2M ago

तुम जियो हज़ारों साल

जब  आप जन्मदिन मनाते है    लोग शुभकामनाये देते हुए ,अक्सर ये गीत गाते है कि तुम जियो हज़ारों साल और हर साल के दिन हो पचास हज़ार आप अपने शुभचिंतकों का करते शुक्रिया है पर क्या आपने कभी गौर किया...
काव्य का संसार · 2M ago

नोटबंदी या अनुशासनपर्व

नोटबंदी  या अनुशासनपर्व जब से आयी है ये नोटबन्दी फिजूल खर्चों पर ,लग गयी है पाबन्दी हम सबकी होती ,ऐसी ही आदत हैकि हमारे पास होती ,पैसों की जितनी भी सहूलियत है हम उतना ही खर्च करते है खुले हा...