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नवोत्पल · 4h ago

साहित्य के प्रतिमान नदी के किनारे हैं- राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी
नवोत्पल · 1d ago

#29# साप्ताहिक चयन: 'कवितायें' / सौरभ सिंह 'शेखर '

सौरभ सिंह 'शेखर 'इस बार का साप्ताहिक चयन थोड़ी देर में आ पाया है l इसका कारण यह कत्तई नहीं है कि प्रक्रियाओं में विलम्ब था कोई l इसका कारण एक झिझक थी l कवि की प्रेषित सभी कविताओं को नवोत्पल पर लाने का लोभ था, पर हमारा अब तक का 'एक कविता का अनुशासन'  ह...
नवोत्पल · 3h ago

जीवित जातियाँ वहीं हैं जो आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करती हैं; अपने आज के जीवन में जीती हैं।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण गौरव नक्षत्र हैं l आपका जन्म २६ अगस्त १८९१ को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ था l आपका लेखन किन्ही ख़ास विधा में बांधा नहीं जा सकता किन्त...
नवोत्पल · 6d ago

#28#साप्ताहिक चयन: 'मुझे लगता है जल्द ही प्रेम कर लेना चाहिए '/ नीतेश मिश्र

नीतेश मिश्रप्रेम...! पीढियां गुजरती हैं, लोग आते-जाते हैं. प्रेम बना रहता है । इसके बस कायदे उलट-पुलट होते रहते हैं पर ये बना रहता है पुरी शिद्दत के साथ।  नीतेश मिश्र जी की कविता एक अल्हड़ अ...
नवोत्पल · 2W ago

#६# दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा

दिल की डायरी: मन्नत अरोड़ा बेटी स्कूल जाने लगी थी। तो सोचा कि दूसरे बच्चे के बारे में कुछ सोचते हैं पर बेटा ही भगवान् देगा इसका तो कुछ पक्का नहीं।तो या तो एबॉर्शन या फिर बेटा। अब एक और बेटी इ...
नवोत्पल · 2W ago

दिल्ली की किताब / शचीन्द्र आर्य

किसी अज़ीम शायर ने क्या खूब कहा है-मीलों तक पसरी दिल्ली का यह भी एक तवारुफ़ है,कुछ अफसानों की कब्रें हैं कुछ कब्रों के अफसाने हैं. ग्यारह बार उजड़ी और हर बार और उम्दा बसी देहली अपने आप में बोलत...
नवोत्पल · 2W ago

#27#साप्ताहिक चयन: 'फोन की ट्रिन-ट्रिन'/ राजलक्ष्मी शर्मा

जैसे बरसों से इंसान तरसा हो और मोबाइल फोन ने सहसा बतियाने का मौका दे दिया बेशुमार l उम्मीद थी कि लोग पास आयेंगे, दूरी बस एक मिथ बनकर रह जायेगी और लोग सामाजिकता और मानवता के नए सोपान चढ़ जायें...
नवोत्पल · 3W ago

#1# अनएडवरटाइज्ड / समरेन्द्र उपाध्याय

आज का सूरज, बाजार है और विज्ञापन उसका प्रकाश. काम की-बेकाम की सारी चीजें जो हमारे पास पसरने को मजबूर है और जिसे हम भोगने को मजबूर हैं; उन सभी का बेरहम जरिया विज्ञापन की विधा है, जो जितनी जीवंत दिखाई पड़ती है उतनी ही बेदर्द भी है. बाजार विकल्प का भ्रम ...
नवोत्पल · 3W ago

#26# साप्ताहिक चयन: 'मुझे मौन होना है '/ हिमांशु पाण्डेय

जब क्षण क्षण के हर रेशे में वह सुन्दरतम सनातन महसूस होने लग जाए, हरी दूब के नोकों में, नयी पत्तियों के स्पर्श में जब महसूस होने लगे परम और हवा की हर रौं में जब मचलने लगे मन उस शाश्वत लय में ...
नवोत्पल · 3W ago

अख्तर पिया जब पहुंचे लखनऊ से मटिया बुर्ज : ई. एस. डी. ओझा

#StatusOfStatusEr S D Ojhaअख्तर पिया जब पहुंचे लखनऊ से मटिया बुर्ज .लखनऊ के नवाब वाजिद अली...