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बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

बैंकों में राजभाषा की असली तस्वीर

हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर है इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारी हिंदी के प्रति सोच और व्यवहार है. सार्वजनिक मंच पर हिंदी को प्रशासन और जनसाधारण की एक मात्र भाषा बनाने की प्रतिज्ञा लेकर जब हम...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

क्या सदैव सत्य बोला जा सकता है?

क्या मैं सदैव सत्य बोलता हूँ? बोल पाता हूँ? क्यूँ ? एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आसान भी है और बहुत कठिन भी. बहुत आसान है यह कहना कि जिसे मेरा मन या अंतरात्मा सच मानता है उसे मैं बिना किसी भय य...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

एक सिक्का, दो पहलू (लघु-कथा)

अप्रैल माह रविवार की एक भीगी भीगी सी सुबह थी. खिड़की से बाहर झांकती सुमन बोली ‘रमेश, बाहर देखो कितना सुहावना मौसम है. रात भर ओले और तेज बारिस के बाद बाहर कितना अच्छा मौसम हो गया है. बहुत दिन ...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

नारी सम्मान और हम

जब दामिनी के साथ घटे वीभत्स कृत्य पर सारा देश आक्रोश से उबला तो एक आशा जगी थी कि देश में स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों के प्रति व्यवस्था और जनता जागरूक होगी और इन अपराधों में कमी आयेगी. ...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

“परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का

कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों के उजाले” हाथ में आने पर बहुत खुशी हुई. पुस्तक को एक बा...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

“ एक थी माया” – कहानी संग्रह

श्री विजय कुमार जी का कहानी संग्रह ‘एक थी माया’ हाथ में आते ही उसके आवरण ने मंत्र मुग्ध कर एक माया लोक में पहुंचा दिया. जब मैं पुस्तक के पृष्ठ पलट ही रहा था कि मेरी धर्म पत्नी जी मेरे हाथ से...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

किशोरों में बढ़ती अपराध प्रवृति

समाचार पत्रों में सुबह सुबह हमारे किशोरों की गंभीर अपराधों में शामिल होने की खबरें जब अक्सर देखता हूँ तो पढ़ कर मन क्षुब्ध हो जाता है. कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में खबर थी कि चार किशोरों ने...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

बुजुर्गों में बढ़ती असुरक्षा की भावना

एक समय था जब बुज़ुर्गों की तुलना घर की छत से की जाती थी जिसके आश्रय में परिवार के सभी सदस्य एक सुरक्षा की भावना महसूस करते थे, लेकिन आज वही छत अपने आप के लिये सुरक्षा की तलाश में भटक रही है....
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

भ्रष्टाचार निवारण में परिवार और समाज का योगदान

     भ्रष्टाचार केवल वर्तमान समय की देन नहीं है. यह हरेक युग में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है, यद्यपि इसका रूप, मात्रा और तरीके समय समय पर बदलते रहे हैं. कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थश...
बातें - कुछ दिल की, कुछ जग की · 1M ago

किसकी सुनूँ - इंसानियत या ड़र ?

     २०-२५ साल पहले की घटना है. अपने कार्यालय के कार्य से मुझे गुड़गाँव जाना था. उस समय का गुड़गाँव आज की तरह विकसित नहीं, बल्कि एक छोटा सा शहर था. मैं शिवाजी स्टेड़ियम (दिल्ली) से बस पकड़ क...