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बावरा मन · 1Y ago

जिंदगी मुबारक !

रहें ना रहें हम , महका करेंगे बन के कली बन के सबा बागे वफ़ा में ..सर्दियों में क्यारी की शुरुआत आखिर मेहनत रंग ला ही गई |बात कई महीनों पहले की है | हमारे ऑफिस के प्रांगण में सामने की तरफ खाली पड़ी जगह थी जिसमें मैं पौधे लगाना चाहती थी पर सभी द्वारा मेर...
बावरा मन · 1Y ago

एक हद तक

एक हद तकजीये जा सकते हैं सब सुखएक हद तक ही सहा जा सकता है कोई दुखसरल सी चाही हुई जिंदगी मे...
बावरा मन · 1Y ago

मेरे जाने के बाद

बावरा मन · 1Y ago

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (८) ख़याली दीमक

पिछले 2-3 बरस के सहेज कर रखे सामान को टटोला तो पाया कि वक़्त के साथ-साथ बदलने लगा है सब । उस वक्त के सहेजे इस सामान में फफूंद लगने लग गई है । बहुत बचा के रखा था कि बेशकीमती ये सामान यूँ ही नया नया रहे । पर इक उम्र होती है हर चीज़ की, उसके बाद वो नयापन ...
बावरा मन · 1Y ago

सोच की हद

हर बार सोचती हूँएक हद में सिमट जाऊँकर लूँ अपनी सोच को एक अँधेरी कोठरी में बंद दुनिया की रव...
बावरा मन · 1Y ago

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (७)

                                    खोया कुछ भी नहीं जो पाया था । जो पाया था वो अब तक भीतर...
बावरा मन · 1Y ago

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (६)

               खाली को भरने की कवायद में भरते गए सब कुछ अंदर । कुछ चाहा कुछ अनचाहा । भर गय...
बावरा मन · 1Y ago

कुछ ख़्वाब कुछ ख़्वाहिशें

‘समर्पण की पराकाष्ठा ही शायद उपेक्षा के बीज अंकुरित करती है और कविता को विस्तार भी यहीं से...
बावरा मन · 1Y ago

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (५)

                     पहली बार जब जिन्दगी ने दरवाजा खोला था उस पल क्या महसूस किया होगा इस एहसास से अनभिज्ञ होते हैं हम | धीरे धीरे दरवाजे को लाँघ कर जब जिंदगी के आशियाने में प्रवेश करते हैं तो दुख सुख के कमरे मिलते हैं जिनकी चार दीवारी को हम अपनी इच्छ...
बावरा मन · 1Y ago

आओ दीप जलायें

आओ दीप जलायें देहरी में मंगल का आँगन में सुख का कमरे में शान्ति का खिड़की में आस का बरामदे में ख़ुशी का मंदिर में भक्ति का दिल में उमंग का प्रेम के हर रंग का आओ दीप जलायें आओ दीप जलायें !!