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Ae pakhuri papeeha · 2W ago

गुज़रा साल और तुम

तेरे आज और कल के दरमियान/ एक सदी गुज़र गयी एक साल मे// खोल कर मुट्ठी झान्क कर देख/ पिघला दिल सोया है किस हाल मे// जिसकी याद मे ठोकरे खायी है/ खुद से खुद का हाल छुपाते// रुक कर मुडके एक बार न देखा/ कर जो बेहाल गया,उस ख्याल ने। Filed under: कविता Tagged: [...]
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Ae pakhuri papeeha · 3W ago

कटी पतन्ग है तू

तेरे वादे तुझसे झूठे निकले आस्मा क्यू तुझसे प्यार करे कटी पतन्ग है तू लापरवाह हवा का रुख क्या इन्तज़ार करे बादल की हो पवन बसन्ती इठलाए,गगन भी आह भरे बरस गया गर आस्मा रो कर तेरी हस्ती को मिटा जायेगा आह भर के तुझे छू जाऊन्गी सीने मे जब धरा के समायेगा Filed under: [...]
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Ae pakhuri papeeha · 3W ago

फ़ुर्सत – रविवार

फ़ुर्सत ने दस्तक दी आज रविवार के दिन पुरानी यादो का बस्ता बोझे मे था लाया बुझे लम्हो की धूल हटा के अन्दर झान्का हमारे रिश्ते का बहिखाता पहले हाथ आया पुरानी आदत है हिसाब शुरु से बान्चती हू मै पीले पडे पहले पन्ने पे जा हाथ थम सा गया सिरहन हुई, छू के जगा [...]
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Ae pakhuri papeeha · 1M ago

फ़टी पहरन

दिखाई न दू ज़माने भर को कभी भी सोना कोई जादुई तरक़ीब तुम मुझे सिखा दो ना दिन भर ज़माने मे जहा से भी गुज़रती हू भूखी नज़रे मेरे तन से लिपट साथ आती है रोज़ दागदार कर देती है मेरा कोरा दामन रोज़ रगड वहशियत तन को छील जाती है छाले पड गये है [...]
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Ae pakhuri papeeha · 1M ago

एक गुलाबी चश्मा

अपने अन्तहीन सवालो के जन्गल से जब कभी बाहर निकलोगी तुम सोना देखोगी खयालो के दलदल मे फ़न्सी कितनी पीछे छोड आयी हो खुशी को इतनी बेरन्गी नही है दुनिया तुम्हारी जितनी तुम समझती आयी हो सोना वक़्ती तूफ़ान से उडे गम के दो छीन्टे तुम्हारे चश्मे के फ़्रैम पर आ बस गये थे कम्बख्त [...]
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Ae pakhuri papeeha · 2M ago

अन्दाज़ ए हुनर

ज़ो राते कटती थी लिख कर,अब सो कर गुज़रती है निगल गया सुकून ए समन्दर मेरा अन्दाज़ ए हुनर ज़ो आन्खे ख्वाब बुनती थी सजाने सपनो का शहर रहनुमा बन सुला गया सुकून रात के तीसरे पहर अब न मै पिया की रही न साहिर की न सौदायी की खुली पलको पे नीन्द सजाती हू [...]
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Ae pakhuri papeeha · 2M ago

हरसिन्गार के फ़ूल

ज़िन्दगी रेत के टीलो की गुलाम है अब जो महकती थी फ़िज़ा मे कभी दुआ बन कभी हरसिन्गार के फ़ूल सजा तन मन धूल मे सनी है वादिया ख्वाबो की अब आन्धिया चलती है बैरागी बन आजकल तुम नज़र आ कर भी दिखाई नही देते कानो तक आ रुक जाती है कुछ सदाए लफ़्ज़ हो [...]
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Ae pakhuri papeeha · 2M ago

आइना

मेरे आईने को एक नयी तकलीफ़ लग आयी है मेरे चहरे का मुआयना करने की ज़िद्द लगायी है कल शिकायत थी बालो मे क्यू चान्दी उतर आयी आज बोला कौव्वे उग रहे है आन्खो के कोनो पर हद्द कर दी कम्बख्त ने जब बिन्दी माथे पे सजायी बोला हया लाल रन्ग बन माथे पे क्यू [...]
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Ae pakhuri papeeha · 2M ago

कल मिले न मिले

ज़ो खबर कल तक खास थी वो आम हो गयी तेरी चाहते जहान मे कितनी बदनाम हो गयी रहती थी इन्तज़ार मे जो वस्ल – ए- यार की वो मुस्कुराहटे खुशी से क्यू अनजान हो गयी खाली खाली पन्नो पे किस्से हज़ार बान्च्ता था गोया दिल वो खत का लिफ़ाफ़ा क्यू बन गया बाज़ार से [...]
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Ae pakhuri papeeha · 2M ago

त्रिवेनी

त्रिवेनी तुझ तक पहुन्चती भी तो कैसे ताड से ऊन्चे कद तेरे वादो के बौनसाई सी छोटी हसरत मेरी Filed under: कविता Tagged: त्रिवेनी
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