पूर्ण विराम
पूर्ण विरामसुना जब कहते हुए कि _अर्ध विराम उनके जीवन में ,इसकी तो कल्पना भी न थी ।देखी जब मैं हूँ अकेली ,गयी पास कही कानों में _कुछ तो बोलो हो क्यों चुप ?पर वह चुप्पी ऐसी कि ,स्वप्न क्या तंद्रा भी टूटी ।सारे सपने और लगी भी छूटी , पर मन माना न फ़िर भी
मुझे मेरा बचपन लौटा दो
" मुझे मेरा बचपन लौटा दो "मुझे मेरा बचपन लौटा दो ,कदम्ब तो नहीं झूले पर झुला दो ।याद नहीं माँ की थपकी ,और न मधुमय तुतलाना ।स्मरण नहीं वे लम्हें अब तो ,उन लम्हों को सास्वत ही बना दो ।मुझे मेरा ...................... ।परीकथा की परी समझ ख़ुद ,आते होठों प
यादें (दूसरी कड़ी )
मुझे अपने बचपन की बहुत कम बातें ही याद , पर कुछ बातें जिसे माँ बराबर दुहराती रहती थी और हमेशा सबको बताती थी, वह मानस पटल पर इस तरह बैठ गए हैं कि अब शायद ही भूल पाऊँ । उनमें कुछ हैं मेरे और मेरे भाई के बीच का प्रेम। मेरे बाबूजी उस समय भूटान में थे , मैं और मेरा भाई द
भड़ास
"भड़ास "राज बाल की हिम्मत कोदिया चुनौती कईयों नेपत्रकार तो पत्रकारचिट्ठाकार भी कम नहींपत्रकारों ने बिक्री बढ़ाईअखबार और पत्रिकाओं कीदूरदर्शन ने टी आर पी बढ़ाईनेताओं के झूठे मंतव्यों सेफिर चिट्ठाकार क्यों प
मेरा एक १०० वाँ पोस्ट
(मेरा १०० वाँ पोस्ट मेरे उस साथी को समर्पित जिसने मुझ पर विश्वास किया ।)"जीवन तो है क्षण भंगुर"बिछड़ कर ही समझ आता, क्या है मोल साथी का ।जब तक साथ रहे उसका, क्यों अनमोल न उसे समझें ।अच्छाइयाँ अगर धर्म है, क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।सराहने मे अहँ
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