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आच्छादित आकाश
सुबह से ही आकाश बादलों से घिरा था..... उसके मन की तरह कितने ही डगमगाते भावों से आच्छादित ...बालकनी से एकटक बाहर देखती हुयी.... बहुत द
प्रेमवर्षा
शायद तुमको याद होगाऐसी ही बरसात के बादएक प्रेमगीतमेरे जीवन सुर परलहराया थाबहा थाझर झर निर्झरइन नयनों स
अपनी ही तलाश ! (पॉङ्वखोली )
दुसरे दिन सुबह हमने द्वाराहाट से दूनागिरि मंदिर की तरफ प्रस्थान किया ....कहानी है की...जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी बूटी लेकर वापस आ रहे थे, तब द्रोणॉचल पर्वत का इक हिस्सा यहाँ पर टूट कर गिर गया था.....फिर बारहवी शताब्दी में कत्यूरी राजाओं ने यहा
बेचारा बचपन
उस रोज़ .......सड़क किनारे बने ढाबे पर चुपचाप चाय का ज़ायक़ा समझ रही थी अचानक नज़र पड़ी ब
रंगरंगीला उत्तराखंड !
कल ही उत्तराखंड यात्रा से वापिस आयी हूँ सबकुछ अभी आँखों में बखूबी समाया हुआ हैं इसलिए यूरोप अगली पोस्ट में लिखूंगी.....ले चलती हूँ आप सभी मित्रों को उत्तराखंड की सैर पर .......
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